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निगम के दो अभियान, दोनों बेअसर, जनप्रतिनिधि-अधिकारी चुप, लोग हो रहे परेशान

भोपाल। निगम ने जनता से जुड़े दो अभियान चलाए। नतीजा, दोनों फेल और जिम्मेदार चुप्प। परेशान हो रही है तो जनता लेकिन अधिकारी से लेकर निगम के जनप्रतिनिधि की है कि उन्हें चिंता ही नहीं है। पहला अभियान सड़कों को मवेशी मुक्त करने और दूसरा अभियान त्योहारी सीजन में बिना लाइसेंस शहर में जगह-जगह संचालित मांस दुकानों को बंद करने के लिए चलाया गया था। पहले अभियान में मैदानी अमले ने 48 स्थानों में से कुछ स्थानों से दो और कुछ से पांच मवेशी पकड़े और उन्हें दूसरी जगह ले जाकर छोड़ दिया। ये मवेशी फिर सड़कों पर जाकर बैठ गए। जिसकी वजह से कभी जाम लग रहा है तो कभी लोग दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं। दूसरे अभियान में अमले ने कुछ मांस दुकानों के खिलाफ जुर्माने की कार्रवाई की। अब वे ही दुकानें उसी जगह पर चल रही है। वहीं से जुर्माना लगाने और वसूल करने वाला निगम अमला गुजर रहा है लेकिन दोबारा कार्रवाई नहीं की जा रही। नतीजा संबंधित क्षेत्रों में आवारा कुत्ते आक्रमक हो रहे है। गंदगी फैल रही है। लोग परेशान हैं।

कैटल फ्री अभियान के शुरुआती दौर एक सप्ताह तक तो गोवंश पकड़ने की कार्रवाई होती रही, इसके बाद अधिकारी और कर्मचारियों ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया। हालांकि कागजों में अभी भी इन अभियान के नाम पर निगम कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जा रही है, लेकिन ये मैदान से गायब रहते हैं। यही हाल अवैध मांस दुकानों के खिलाफ शुरु हुई कार्रवाई का हुआ। करीब 15 दिन तक चले अभियान में निगम अमले ने करीब 500 दुकानों के खिलाफ गंदगी फैलाने व खुले में मांस बेचने पर जुर्माना लगाया। लेकिन फिर भी खुले में मांस विक्रय बंद नहीं हुआ।

बिना तैयारी शुरु किया अभियान

नगर निगम ने कलेक्टर के निर्देश पर गोवंश पकड़ने का अभियान तो शुरु कर दिया, लेकिन इसके लिए पर्याप्त संसाधनों की व्यवस्था नहीं की गई। शहर में निगम के कांजी हाउस पहले से ही फुल थे, अभियान शुरु हुआ तो ग्रामीण क्षेत्र में संचालित गौशालाएं में भी जगह नहीं बची।

12 अगस्त को शुरु हुए अभियान में पहले दिन 45 पशु पकड़े। दूसरे दिन फिर 61 पशु पकड़े गए। एक सप्ताह तक ऐसा ही चला फिर परियोजना शाखा में रोजाना कर्मचारियों को मुहिम के लिए कागजों में भेजा जाता है। लेकिन कार्रवाई के नाम पर एक भी पशु नहीं पकड़ा।

पशु पालकों पर कार्रवाई नहीं होती कार्रवाई

सड़कों पर गोवंश बढ़ने का एक बड़ा कारण पशु पालक हैं, जो दूध निकालने के बाद इन्हें सड़कों पर छोड़ देते हैं। जबकि डेरियों के आसपास गोवर्धन परियोजना के कर्मचारी भी कार्रवाई नहीं करते, क्योंकि डेरी संचालकों से इनकी मिलीभगत होती है। यदि गलती से किसी पालतू गोवंश को पकड़ भी लिया, तो मामूली जुमाने के बाद छोड़ दिया जाता है। लेकिन पशु पालकों पर कोई कार्रवाई नहीं होती।

प्रत्येक जोन में 60 से 70 मांस दुकानें

23 अगस्त से नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग ने शहर में अवैध स्लाटिंग करने और मांस बेचने वालों के खिलाफ मुहिम शुरू की। पहले ही दिन निगम को जोन एक के कार्यालय के पास बिना लायसेंस मांस की दुकानें चलती मिलीं। करीब आठ दुकानदारों पर निगम ने कार्रवाई भी गई। अगली कार्रवाई डीआईजी बंगला सहित कांजी कैम्प इलाके में हुई। लेकिन एक सप्ताह बाद ये भी बंद हो गई। जबकि हर जोन में औसतन 60 से 70 मटन-चिकन की दुकानें हैं।

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