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जन से पहले ‘यात्रा’ को कार्यकर्ताओं के ‘आशीर्वाद’ की दरकार

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं राजनीतिक दलों की सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। भाजपा जनआशीर्वाद यात्रा निकालकर लोगों के बीच पहुंच रही है। वरिष्ठ नेताओं को यात्रा प्रभारी बनाने के साथ ही रथ के साथ भ्रमण की जिम्मेदारी भी सौंपी जा रही है, लेकिन जनता तो दूर यात्रा को फिलहाल कार्यकर्ताओं के आशीर्वाद की आवश्यकता अधिक है। नीमच से शुरू हुई यात्रा पर पहले पथराव की घटना हो गई। यात्रा जब मंदसौर पहुंची तो जिला मुख्यालय पर यात्रा के स्वागत के लिए मुट्ठी भर लोग ही पहुंचे। यह दृश्य देखकर वरिष्ठ नेताओं ने जब नाराजगी जाहिर की तो कुछ कार्यकर्ताओं ने दबी जुबान से कहा- भाई साहब जब यात्रा के संभागीय प्रभारी बंसीलाल गुर्जर, सांसद सुधीर गुप्ता और विधायक यशपाल सिसौदिया तीनों मंदसौर के होने के बाद भी यदि यह हाल है तो अंदाजा लगा लीजिए हम कहां खड़े हैं। इसके बाद निरुत्तर होने की बारी वरिष्ठ नेताओं की थी।

देखें अब अगला शिकार कौन होगा…

चुनावी रण में अपेक्षा और उपेक्षा नामक दो अस्त्र इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में है। कहीं अपेक्षा पूरी नहीं होने पर बरसों का साथ मिनटो में छूट रहा है तो कहीं उपेक्षा होने पर दूसरा दल भा रहा है। बीते दिनों मालवा-निमाड़ क्षेत्र में भाजपा को ऐसे ही दो झटके लगे। पूर्व मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता दीपक जोशी ने उपेक्षा से नाराज होकर पार्टी छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया। इसके बाद इक्का-दुक्का नेताओं की आवाजाही चलती रही, लेकिन यह चर्चा एक बार फिर तब शुरू हुई जब पुराने भाजपाई और पूर्व विधायक भंवरसिंह शेखावत एक दिन पहले तक पार्टी के प्रति निष्ठा जताने के बयान देते-देते कांग्रेसी हो गए। यहां अपेक्षा पूरी नहीं होना वजह बना। दरअसल शेखावत अपनी पुरानी विधानसभा सीट वापस चाहते थे लेकिन यह सीट समझौते में फिलहाल ‘महाराज भाजपा’ के पाले में है। अब सियासी गलियारों में यही चर्चा है कि देखें कांग्रेस का अगला शिकार कौन होगा।

कितनी कारगर होंगी संगठन के सूखे पर नियुक्ति की बौछारें

इंदौर में कांग्रेस की सियासत बीते कई सालों से आपसी खींचतान और शह-मात के खेल में उलझी रही। कभी शहर अध्यक्ष की नियुक्ति का मसला दिल्ली दरबार तक पहुंचा तो कभी महिला कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर पदाधिकारी इंदौर-भोपाल एक करते रहे। चुनाव के पहले ही सही आखिरकार संगठन को मजबूती देने की याद कांग्रेसी क्षत्रपों को आ ही गई। अमन बजाज को प्रदेश कांग्रेस महामंत्री और गोलू अग्निहोत्री को शहर कांग्रेस का कार्यवाहक अध्यक्ष बना दिया गया। नियुक्ति पत्र इंटरनेट मीडिया के माध्यम से वायरल होते ही सियासी गलियारों में इसके मायने और जोड़ घटाव शुरू हो गए। संगठन के दूसरे खेमों ने नई नियुक्ति को लेकर अपने नेताओं के फोन घनघनाना शुरू कर दिए तो कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई कि इस बार की कांग्रेस के ये गुट आपस में लड़ेंगे या फिर विधानसभा चुनाव सामने देखकर साथ काम करने में जुट जाएंगे।

इतना सन्नाटा क्यों है भाई???

गांधी भवन यानी शहर में कांग्रेस का कार्यालय। चुनावी समय में यही उम्मीद कार्यकर्ताओं और लोगों को होती है कि इस समय तो पूरे दिन राजनीतिक दलों के कार्यालयों पर गहमा-गहमी होगी ही। लेकिन गांधी भवन की स्थिति देखकर ऐसा नहीं लगता। विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय नेताओं की बात छोड़ दी जाए तो संगठनात्मक रूप से कांग्रेस की मैदानी सक्रियता शहर में नजर नहीं आती। न संगठनात्मक रूप से तय कार्यक्रम हो रहे हैं न पदाधिकारी चुनावी तैयारियों के लिए उतनी तेजी से सक्रिय हैं। इस सन्नाटे और सुस्ती से हैरान कार्यकर्ता जब कांग्रेस कार्यालय के बाजू से गुजरता है तो यह सवाल अवश्य करता है कि इतना सन्नाटा क्यों है यहां। आगामी हफ्तों में भाजपा की आशीर्वाद यात्रा इंदौर भी पहुंच रही है। वहां नेता और पदाधिकारी तैयारी में जुटे हैं लेकिन यहां सन्नाटा अब भी कायम है। देखना यह है कि ये सुस्ती आखिर कब दूर होगी।

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