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कोरोना जैसी महामारी के लिए दुनिया कितनी तैयार? पैंडेमिक एक्सपर्ट की बड़ी चेतावनी

दुनिया के जाने माने महामारी विशेषज्ञ माइकल बेकर का बड़ा दावा सामने आया है. ओटागो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बेकर ने कहा है कि ग्लोबल पैंडेमिक एग्रीमेंट को अपनाने में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की हालिया विफलता आने वाले समय में किसी बड़ी बीमारी से निपटने की हमारी क्षमता में बड़े अंतर पैदा करती है. उन्होंने कहा कि कोविड जैसी एक और महामारी जो एक सदी की सबसे भयानक महामारी है का खतरा बढ़ रहा है.

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, बेकर ने आगे कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने मौजूदा कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य रेगुलेशन में उपयोगी संशोधन अपनाकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. हालांकि यह प्रगति जश्न मनाने लायक है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. भले ही सरकारें संशोधित नियमों को मंजूरी दे दें, इतिहास को दोहराने से रोकने का हमारा सबसे अच्छा मौका एक महामारी समझौते में निहित है.

उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य खतरों के प्रति वैश्विक प्रतिक्रियाएं 1851 में एक अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता सम्मेलन से चली आ रही हैं, जो हैजा के प्रसार को सीमित करने के उपायों पर केंद्रित थी. तब से, वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में सुधार के लिए कई पहल किए गए. इसमें 1946 में डब्ल्यूएचओ का गठन भी शामिल है. 2005 के अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियम इस विकास में एक प्रमुख कदम थे. बहरहाल, यह जल्द ही स्पष्ट हो गया कि नए उपकरण जूनोटिक रोगों (जब एक पशु के लक्षणों से इंसान संक्रमित होते हैं) के तेजी से जटिल होते और लगातार बढ़ते खतरे से निपटने में सीमित थे.

इंटरनेशनल हेल्थ रेगुलेशन में प्रमुख परिवर्तन

माइकल बेकर ने कहा कि इस महीने की शुरुआत में, डब्ल्यूएचओ विश्व स्वास्थ्य सभा के 194 सदस्यों ने सर्वसम्मति से अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियमों में कई महत्वपूर्ण संशोधन पारित किए. इसमें अंतरराष्ट्रीय चिंता की सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों की व्यापक श्रेणी के भीतर ऐसी घटनाओं के महत्व पर जोर देने के लिए ‘महामारी आपातकाल’ की परिभाषा जोड़ना, ‘तैयारी’ के विशिष्ट उल्लेख के साथ रोकथाम पर ध्यान बढ़ाना, ‘समानता और एकजुटता’ और एक समर्पित ‘समन्वय वित्तीय तंत्र’ के विशिष्ट उल्लेख के साथ चिकित्सा उत्पादों और वित्त तक न्यायसंगत पहुंच को मजबूत करना शामिल थे.

वे प्रस्ताव जो इस समझौते के विफल होने का कारण बने

बेकर ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य सभा में सभी प्रस्तावित संशोधन अमल में नहीं लाए गए. कुछ टिप्पणीकारों ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के अनुभव को शामिल करने की वकालत की, जिन्होंने टीकों और अन्य हस्तक्षेपों को शुरू करने के लिए समय देकर, कोविड के प्रसार में देरी करने के लिए उन्मूलन रणनीति का उपयोग किया था. इस तरह के उपायों ने हाई इनकम वाले द्वीपों (एओटेरोआ न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, ताइवान) के साथ-साथ महाद्वीपीय एशिया (वियतनाम, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस, मंगोलिया) में निम्न और मध्यम आय वाले देशों की रक्षा की.

अन्य संभावित सुधारों की एक श्रृंखला भी इसे अंतिम पाठ में शामिल करने में विफल रही. इनमें जानवरों से ज़ूनोटिक संक्रमण के बहाव को रोकने, वैज्ञानिक डेटा और नमूनों को साझा करने में वृद्धि और जवाबदेही को मजबूत करने पर जोर दिया गया. सभी डब्ल्यूएचओ सदस्य देशों के पास प्रस्तावित संशोधनों पर विचार करने के लिए अब 18 महीने का समय है. वे उन हिस्सों पर आपत्ति दर्ज कर सकते हैं जिनसे वे असहमत हैं, भले ही इससे प्रस्तावित संशोधनों की सुसंगतता कमजोर हो सकती है.

हमें अधिक वैश्विक सहयोग की आवश्यकता क्यों है?

उन्होंने कहा कि एक महामारी समझौता कई आवश्यक सुधारों को संबोधित कर सकता है जो अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियमों से परे हैं. लेकिन वैश्विक समझौते तक पहुंचने की बातचीत विवादास्पद साबित हो रही है. विकासशील देशों के लिए टीकों, उपचारों और निदानों की साझेदारी और किफायती मूल्य निर्धारण को लेकर अमीर और गरीब देशों के बीच गहरे मतभेद हैं. रोगजनक डेटा साझा करना भी समस्याग्रस्त साबित हुआ है.

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