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अरे! ऐसा भी होता है क्या? मौत के 10 साल बाद तक हर चुनाव में वोट करने आए दादा जी

चुनाव आयोग ने हाल ही में हैदराबाद में वोटर लिस्ट का क्रास वैरिफिकेशन कराया था. इसमें 5.41 लाख से अधिक ऐसे लोगों के नाम वोट बने थे, जो काफी समय पहले ही मर चुके हैं. बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के भी वोट पाए गए, जिनके पते पर उस आदमी का कोई अस्तित्व ही नहीं था. चुनाव आयोग ने यह सभी वोटर लिस्ट से हटा दिए हैं. यह मामला सोशल मीडिया पर काफी वायरल है. सवाल उठता है कि क्या वोटर लिस्ट में इस तरह की गड़बड़ी केवल हैदराबाद में ही है? इस सवाल का जवाब ना में होगा.

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का यह मामला फर्जी वोटिंग से सीधे तौर पर जुड़ा है. दरअसल, चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट बनाने की जिम्मेदारी बूथ लेबल अफसर (BLO) को दे रखी है. शहरों में तो बीएलओ घर घर घूम कर वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने या कटवाने के फार्म भरवाते हैं, लेकिन गांवों में आज भी बीएलओ गांव के प्रधान या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के घर बैठकर यह सारी प्रक्रिया पूरी कर लेते हैं. ऐसे स्थिति में वह प्रभावशाली व्यक्ति चुनाव में लाभ लेने के लिए अपनी मर्जी से फर्जी नाम जुड़वा देते हैं.

बीएलओ की लापरवाही से जुड़ते है फर्जी नाम

कई बार छोटे छोटे बच्चों के नाम भी वोटर लिस्ट में जुड़वा दिया जाता है. इसी प्रकार जो लोग मर चुके हैं, उनकी जानकारी बीएलओ को नहीं दी जाती, इसलिए वह नाम वोटर लिस्ट में लगातार बने रहते हैं. यही कारण है कि कभी भी सौ फीसदी वोटिंग का आंकड़ा पूरा नहीं हो पाता. वहीं वोटर लिस्ट में फर्जी नाम दर्ज होने का फायदा प्रभावशाली लोग उठाते हैं और दूसरे लोगों को उसी नाम पर भेज कर वोट कराते हैं. उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के गांव हल्दीरामपुर के रहने वाले जग्गू के नाम से आज भी वोट पड़ता है, जबकि जग्गू की मौत 1998 में ही हो गई थी.

ऐसे होती है दूसरों के नाम पर वोटिंग

केवल जग्गू ही नहीं, इस गांव में ऐसे सौ से अधिक मृत लोगों के वोट हर चुनाव में पड़ते हैं. इनमें एक कतवारु भी हैं, जिनकी मौत 80 के दशक में हो गई थी. यह तो मृत लोगों के उदाहरण हैं, कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं, जिनमें इस गांव के लोग आज तक वोट डालने कभी पोलिंग बूथ पर गए ही नहीं और हर चुनाव में उनके वोट डलते आ रहे हैं. यह सारी धांधली पोलिंग बूथों पर तैनात प्रत्याशियों के एजेंटों की सहमति से होता है. हालांकि 1990 के बाद हुए चुनाव सुधारों की वजह से इस तरह की फर्जी वोटिंग के मामलों में अब काफी कमी आई है. इसी समस्या के समाधान के तौर पर चुनाव आयोग ने पोलिंग एजेंटों की एंट्री बूथ के अंदर रोक दी है. वहीं प्रत्याशियों के टेबल भी बूथ से 100 मीटर दूरी पर कर दिया है.

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