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PM मोदी की जाति को लेकर क्या है पूरा विवाद? राहुल ने कहा, वो जन्मजात ओबीसी नहीं!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जाति पर एक बार फिर से विवाद हो रहा है. इस बार विवाद को हवा कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और वायनाड से सांसद राहुल गांधी ने दी है. राहुल ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान पीएम पर हमला बोलते हुए कहा कि मोदी जन्मजात ओबीसी नहीं थे, पीएम बनने के बाद उन्होंने अपनी सामान्य वर्ग की जाति को ओबीसी में तब्दील कर दिया. आइये जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जाति को लेकर पहली बार कब सवाल उठा था, किसने उठाया था और अभी इस मामले का क्या स्टेटस है.

सन् 2014 में जब पहली बार नरेंद्र मोदी ने खुद को पिछड़ा वर्ग का बताया था तो इस पर खासा विवाद हुआ था. तब कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि मोदी ने सत्ता में आने के बाद अपनी जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करा दिया. हालाँकि, गुजरात सरकार ने सफ़ाई में कहा था कि घांची (तेली) समाज को 1994 से गुजरात में ओबीसी का दर्जा मिला था. नरेंद्र मोदी इसी घांची जाति के हैं.

शंक्ति सिंह गोहिल के आरोप

तब कांग्रेस नेता शंक्ति सिंह गोहिल ने आरोप लगाया था कि मोदी 2001 में मुख्यमंत्री बने और राजनीतिक लाभ लेने के लिए 2002 में अपनी जाति को पिछड़ी जाति में डाल दिया. इस आरोप पर गुजरात सरकार की ओर से दिए गए जवाब के चलते विराम लग गया था. ओबीसी में किसी भी जाति को शामिल करने के लिए राज्य सरकार की ओर से सामाजिक पिछड़ेपन और आंकड़ों के आधार पर आरक्षण मुहैया कराया जाता है.

102वां संशोधन, 3 नए आर्टिकल

2018 में संसद ने संविधान में 102वां संशोधन पारित किया था जिसमें संविधान में तीन नए अनुच्छेद शामिल किए गए थे. नए अनुच्छेद 338-बी के जरिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया. इसी तरह एक और नया अनुच्छेद 342ए जोड़ा गया जो अन्य पिछड़ा वर्ग की केंद्रीय सूची से संबंधित है. तीसरा नया अनुच्छेद 366(26सी) सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को परिभाषित करता है.

इस अधिनियम के पारित होने के बाद यह सवाल उठा कि क्या संविधान में किए गए संशोधनों का मतलब यह है कि ओबीसी की एक केंद्रीय सूची होगी जो प्रत्येक राज्य के लिए ओबीसी को नामित करेगी. इसने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें राज्यों की ओबीसी की अपनी सूची तैयार करने और बनाए रखने की शक्ति के बारे में भ्रम पैदा हुआ.

2018 में संसद ने संविधान में 102वां संशोधन पारित किया था जिसमें संविधान में तीन नए अनुच्छेद शामिल किए गए थे. नए अनुच्छेद 338-बी के जरिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया. इसी तरह एक और नया अनुच्छेद 342ए जोड़ा गया जो अन्य पिछड़ा वर्ग की केंद्रीय सूची से संबंधित है. तीसरा नया अनुच्छेद 366(26सी) सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को परिभाषित करता है.

इस अधिनियम के पारित होने के बाद यह सवाल उठा कि क्या संविधान में किए गए संशोधनों का मतलब यह है कि ओबीसी की एक केंद्रीय सूची होगी जो प्रत्येक राज्य के लिए ओबीसी को नामित करेगी. इसने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें राज्यों की ओबीसी की अपनी सूची तैयार करने और बनाए रखने की शक्ति के बारे में भ्रम पैदा हुआ.

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